नागरिकता, राष्ट्रीयता

मृत्युंजय कुमार झा

(स्वयंसेवक) आर.एस.एस

नागरिकता, राष्ट्रीयता

नागरिकता

संविधान में यद्यपि एक ही नागरिकता या सिंगल सिटीजनशिप कहा गया है परन्तु भाषाई अल्पसंख्यक, धार्मिक अल्पसंख्यक, अनुसूचित अल्पसंख्यक आदि को अलग-अलग सुविधाएं प्रदान करने के कारण सब पर समान रूप से सब कानून लागू नहीं हो पाते। जैसे बढ़ती जन-संख्या पर काबू पाने के लिए हम दो-हमारे दो का नारा दिया गया परन्तु यह सर्वविदित है कि इस्लाम ने चार-चार विवाहों की छूट दे रखी है और उन्हें यहां अल्पसंख्यक की श्रेणी में रखा जाने के कारण उस नारे का उनके लिए कोई अर्थ नहीं रह जाता। जन-संख्या का संतुलन बिगड़ कर सम्पूर्ण समाज व्यवस्था को बिगड़ता हुआ हम देख रहे हैं परन्तु द्विधाग्रस्त मानसिकता से संविधान ही प्रभावित है तो आम नागरिक क्या करे? धारा 44 में निहित समान नागरिक कानून इस समस्या का एक मात्र समाधान हो सकता है परंतु दुविधा से ग्रस्त संविधान की ही कुछ धाराएं उसके क्रियान्वयन में बाधक बन जाती हैं।


राष्ट्रीयता

राष्ट्र की पहचान उसकी राष्ट्रीयता ही है। भारत बहुत प्राचीन राष्ट्र है। कई भले-बुरे दिन देखते हुए भी विश्व में आदि, अनादि, अनंत, चिर-पुरातन, नित्य-नूतन राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। कवि इकबाल ने इसकी अमिटता का रहस्य जानने का प्रयत्न किया। यूनान, मिश्र, रोमां सब मिट गये जहां से- यह कहते हुए भारत के बारे में कहा कि कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। इस 'कुछ बात' या रहस्य को भी उन्होंने स्पष्ट किया परन्तु शायद द्विधाग्रस्त मानसिकता के कारण ही उनकी कलम भी लड़खड़ाती नजर आती है। हिन्दू हैं हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा यह लिखने के स्थान पर 'हिन्दी है हम' ऐसा वे लिख बैठे। जब की इस पंक्ति को 'हिन्दोस्तां' इस शब्द का संधि-विच्छेद किया जाए तो हिन्दू या हिन्द यह शब्द ध्वनित होता है, हिन्दी कदापि नहीं। परन्तु द्विधाग्रस्त मानसिकता उनको हिंदू लिखने से रोक रही थी और तर्कसंगत न होते हुए भी उन्होंने हिन्दी हैं हम कह कर अपने को विवादों से परे रखने का प्रयास किया। कुछ ऐसी ही द्विधाग्रस्त मानसिकता अपने संविधान निर्माताओं पर भी छायी रही होगी। संविधान में लिखा गया है कि राज्य का अपना कोई रिलीजन (धार्मिक-मत) नहीं होगा किन्तु यहां सभी रिलीजन अपने-अपने प्रचार करने की सुविधा प्राप्त कर सकेंगे। जिस देश का विभाजन ही रिलीजन के आधार पर द्विराष्ट्रवाद को मानते हुए किया गया हो वहां अपने राष्ट्र का परिचय देने में संकोच क्यों? अपने आप को कैथोलिक कहलाने वाले, प्रोटेस्टेन्ट कहलाने वाले तथा इस्लामिक कहलाने वाले छोटे-बड़े सभी देश मानवतावादी माने जाते हैं, फिर भला अपने आप को हिन्दू देश कह कर हम मानवतावादी क्यों नहीं कहला सकते ? फिर हिन्दू तो कोई सम्प्रदाय नहीं है, सभी सम्प्रदायों की समष्टि को हिन्दू कहा गया है। जिसने सभी मत-पंथों को समादर देते हुए यह कहा है कि जितने मत उतने ही पथ हैं इस विशाल दृष्टि को कोई संकुचित कहे तो उसे नासमझी ही कहना होगा। अपने आप को हिन्दू कह कर ही हम वसुधैव कुटुम्बकम् की परम्परा को निभाने वाले देश बन सकते हैं। हिन्दुत्व ही यहां का राष्ट्रीयत्व हो। हमारा अतीत भी यही कहता है, भविष्य भी यही कहेगा। बस वर्तमान में व्याप्त इस दुविधा से हम मुक्त हो जाएं, यही पर्याप्त है। राष्ट्रीयता के मुद्दे पर संविधान के मुखर न होने का प्रमुख कारण यह दुविधा ही तो है।


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