खेलों की संस्कारशाला : संघ की शाखा

  मृत्युंजय कुमार झा

        (स्वयंसेवक) आर.एस.एस

 

खेलों की संस्कारशाला 

संघ की शाखा

भोजन, पानी और हवा की तरह खेल भी व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकता है। बालपन में तो यह उसका अधिकार ही है। बच्चे मुख्यतः शारीरिक प्रधान खेल खेलते हैं, जबकि बड़े होने पर उसमें कुछ मानसिक खेल भी जुड़ जाते हैं। विश्व की सभी सभ्यताओं में खेलों को महत्त्व दिया गया है। अनेक प्राचीन नगरों के उत्खनन में बच्चों के खिलौने तथा शतरंज, चौपड़ आदि मिले हैं।

सभ्यता एवं संपन्नता के विकास के साथ उपकरण आधारित खेल बने। इनमें क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबॉल, बास्केट बॉल, बैडमिंटन, टेनिस, लॉन टेनिस आदि उल्लेखनीय हैं। इन सबका विकास पश्चिम में ही हुआ। टी.वी. के जीवंत प्रसारण तथा महँगी प्रतियोगिताओं ने इन्हें लोकप्रिय बनाया है। कंप्यूटर और मोबाइल ने भी खेलों में क्रांति की है। बच्चे हों या बड़े, सब उन पर उँगलियाँ चलाते हुए अपना समय काटते हैं और साथ में अपनी आँखें भी खराब करते हैं। इन खेलों का कितना उपयोग है, यह बहस का विषय है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। संघ के काम का आधार एक घंटे की शाखा है। शाखा में यद्यपि योग, आसन, सूर्य नमस्कार जैसे शारीरिक तथा कहानी, गीत, सुभाषित, अमृत वचन, चर्चा आदि बौद्धिक कार्यक्रम भी होते हैं; पर विद्यार्थी और युवाओं की शाखा में 40-45 मिनट बिना उपकरण वाले खेल ही होते हैं। उपकरण न होने से इनमें कुछ खर्च नहीं होता। अतः गरीब हो या अमीर, सब इन्हें खेल सकते हैं। मैदान पर चूने, ईंट के टुकड़े या फिर चप्पल आदि से ही सीमा-रेखा बनाकर ये खेल संपन्न हो जाते हैं।

सच तो यह है कि ये बहुरंगी खेल ही शाखा के प्राण हैं। इनके आकर्षण में बँधकर ही बच्चे शाखा में आते हैं। भले ही संघ का विचार उन्हें बाद में समझ आता है। शाखा में तरुण, बाल, शिशु आदि अलग-अलग समूह (गण) में खेलते हैं। खेल करानेवाला 'गणशिक्षक' कहलाता है; पर ये खेल केवल मनोरंजन या व्यायाम के लिए नहीं होते। उनकी विशेषता संस्कार देने की क्षमता भी है। इनसे स्वयंसेवक के मन पर संस्कार पड़ते हैं, जो उसकी वाणी, विचार और व्यवहार में सदा दिखाई देते हैं। स्वयंसेवक में कई गुणों का भी विकास होता है।

इन खेलों का कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं है। 'हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा' की तरह क्रिया के मामूली परिवर्तन से नया खेल बन जाता है। ये खेल सैकड़ों हैं तथा हर क्षेत्र में इनके अलग नाम हैं। खेलों के नाम में राम, हनुमान, गणेश, कृष्ण तथा कश्मीर, चीन आदि जोड़ने से स्वयंसेवक के मन में जिज्ञासा पैदा होती है, जिसका समाधान बड़े लोग करते हैं। कुछ खेलों के नाम तथा उनके प्राप्त गुणों की चर्चा करना यहाँ उचित रहेगा।

शाखा में कई खेल दो या अधिक दल बनाकर होते हैं। कबड्डी, बैठी खो, रस्सा या दंड खींच, बंदी बनाना, घोड़ा कबड्डी, डमरू दौड़, टैंक युद्ध, चीन की दीवार जैसे खेलों में खिलाड़ी अपनी टीम को जिताने का प्रयास करते हैं। अतः उनमें टीम भावना एवं नेतृत्व क्षमता का विकास होता है। शेर बकरी, वीर बहादुर जैसे खेलों में एक खिलाड़ी साहस एवं कुशलता से बाकी 15-20 लोगों के बीच में घुसता और निकलता है। सब उसकी पीठ पर घूंसे लगाते हैं। संगठन की जंजीर, हिंदू बनाना, स्वर्गारोहण जैसे खेलों से संगठन की भावना मजबूत होती है। गणेश छू, हनुमान की पूँछ, अंधे की लाठी आदि मनोरंजन प्रधान खेल हैं।

शक्ति परिचय, मुरगा युद्ध, हाथी युद्ध, घुड़सवार युद्ध तथा एक टाँग की दौड़उलटी दौड़, मेढक दौड़, भालू दौड़, हाथी दौड़, बिच्छू दौड़, हनुमान कूद, गौरैया दौड़, तीन टाँग की दौड़ जैसे द्वंद्व के खेलों से स्वयंसेवक की निजी ताकत का पता लगता है। संख्या कम होने पर त्रिभुज या छोटा गोला बनाकर यज्ञकुंड, मेरा घररक्षक जैसे कई खेल होते हैं। सामूहिक एकत्रीकरण या शिविर आदि में संख्या 100

या इससे भी अधिक होती है। ऐसे में मैदान पर चक्रव्यूह, कच्छप व्यूह, चतुर्व्यह आदि बनाकर सबको दो सेनाओं में बाँटकर खेल होता है। सभी आयु और कद-काठी के लोग मिलकर पिरामिड भी बनाते हैं।

शाखा पर 40-45 मिनट में प्रायः 10-12 खेल हो जाते हैं। इसके लिए दक्ष, आरम्, एकशः संपत्, गण विभाग आदि आज्ञाओं द्वारा बार-बार रचना बनती एवं बदलती है। इनसे अनुशासन का विकास होता है। खेल में खिलाड़ी की लंबाई के आधार पर ही टीमें बनती हैं। हर जाति, आयु और वर्ग के खिलाड़ी साथ मिलकर दूसरी टीम से संघर्ष करते हैं। इससे स्वयंसेवक के मन में समरसता की भावना पैदा होती है। खेल समाप्ति पर 'कौन जीता-संघ जीता' के उद्घोष से प्रतिद्वंद्विता का मनो-मालिन्य मिट जाता है। ताली बजाकर मस्ती में उत्साहवर्धक गीत गाने से पसीने के साथ ही खेल की थकान भी दूर हो जाती है। इससे उत्साह एवं आनंद का वातावरण बन जाता है।

वर्षा या ठंड में कमरे में बैठकर या भाग-दौड़ के खेलों से थककर स्वयंसेवक बौद्धिक खेल खेलते हैं। इनसे मनोरंजन के साथ ही बुद्धि का विकास भी होता है। अंत्याक्षरी, सूचना, मुक्ताक्षरी, प्रश्नोत्तरी, उलटी गिनती, खाएँगे, चिड़िया उड़, काला सफेद, ऐसा करो वैसा करो, नेता की खोज, डाकघर, मछली की आँख आदि ऐसे ही खेल हैं।

खेलों के बीच में स्थानीय भाषा-बोली में कई तरह के नारे और उद्घोष भी बोले जाते हैं। इनसे देशभक्ति, हिंदुत्व-प्रेम, सद्भाव और सामाजिक समरसता जैसे विचार मन में दृढ़ होते हैं। भारतमाता की जय। वंदे मातरम्। हर हर बम बम। रुद्र देवता-जय जय काली। जय शिवाजी जय भवानी। अलग है भाषा, अलग है वेश-फिर भी अपना एक देश। जय हो-विजय हो। संगठन में शक्ति है। संघे शक्ति-कलौयुगे। जहाँ हुए बलिदान मुकर्जी, वो कश्मीर हमारा है; जो कश्मीर हमारा है, वो सारे का सारा है। हिंदू हिंदू-एक रहेंगे, छुआछूत को-नहीं सहेंगे। हिंदू हिंदू-एक रहेंगे, भेदभाव को-दूर करेंगे। हिंदू हिंदू-भाई भाई। एक दो तीन चार-भारत माँ की जय-जयकार। अन्न जहाँ का-हमने खाया, वस्त्र जहाँ के हमने पहने, उसकी रक्षा कौन करेगा-हम करेंगे हम करेंगे, आदि।

शाखा पर खेल होते हैं; पर वह खेल क्लब नहीं है। इसका कारण खेलों से प्राप्त संस्कार हैं। इसलिए संघ की शाखा से बड़े खिलाड़ी तो नहीं; पर देश के प्रति प्रेम और समर्पण रखनेवाले अनुशासित नागरिक जरूर निर्माण हो रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का उद्देश्य भी तो यही है।


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